9.28.2009

भोजपुरी गजल


आज दशहरा ह नेपाली में कहे के होइ त बडा दशैं. चारू ओर मेला के धूम-धाम के बीच मां दुर्गा के मूर्ति देखे के होड बचपन में बहुत रहे .लेकिन आज दिल्ली में रहला के बावजूद हम इ आनंद से अछूत बानी काहे कि इहां दशहरा के नाम पर राम लीला तक ही लोग अपने के सीमित राखे ला.रोड पर रावण दहन के तैयारी चल रहल बा .मकान के सारा लोग ए गहमागहमी के हिस्सा बने चल गईल बा .हम घर में बैठ के ब्लॉग लिखतानी. हमर रूचि भीड-भाड वाला जगह पर जाए से बचे में ही ज्यादा ह . अभी हम इहे सोचतानी कि का रावण के जला देला से वर्तमान दुनिया के रावण से मुक्ति मिल जाई अगर ना, त एगो विकासशील देश में हर साल एतना पइसा के बर्बादी रोके के उपाय खोजे के पडी.
अभी तक ब्लॉग पर बहुत कुछ लिखल गईल लेकिन हम एमकी दाव भोजपुरी के एगो काफ़ी समर्थ गीतकार, कवि, गजललेखक, साहित्य के सब विधा पर समान रूप से लेखनी चलावेवाला श्री दिनेश भ्रमर के कुछ भोजपुरी रचना दे तानी.भोजपुरी आ हिन्दी साहित्य पर बराबर अधिकार रखे वाला श्री दिनेश जी के कई गो रचना देश के विश्वविधालय के पाठ्यक्रम में भी लागल बा आउर बहुत किताब भी इहां के लिखले बानी.ज्योतिष पर भी इनकर काफ़ी अच्छा पकड बा. महाविधालय में कुछ दिन व्याख्याता पद पर काम कइला के बाद उहां के वर्तमान में खेती-बाडी के काम अपन आवास स्थान बगहा में रह के  देखतानी.
  भोजपुरी साहित्य में गजल आउर रूबाई के जगह दिवावे में इनकर महत्वपूर्ण नाम लेवल जाला. इनकर रचित कुछ निमन-निमन रचना अपना हिसाब से दे तानी अपनहूं लोगन के ई स्वच्छ-सुंदर आ शिष्ट रचना जरूर पसंद आई.

      गजल
आंख में आके बस गइल केहू,
प्रान हमरो परस गइल केहू.
हमरे लीपल पोतल अंगनवां में,
बन के बदरा बरस गइल केहू.
गोर चनवा पै सांवर अंधेरा,
देखि के बा तरस गइल केहू.
फूल त कांट से ना कहलस कुछु,
झूठे ओकरा पे हंस गइल केहू.
कठ के जब बजल पिपिहरी तब,
बीन के तार कस गइल केहू.


       रूबाई
मन के बछरू छ्टक गइल कइसे,
नयन गगरी ढरक गइल कइसे.
हम ना कहनी कुछु बयरिया से,
उनके अंचरा सरक गइल कइसे.

           गजल
नजरिया के बतिया नजरिया से कहि द,
ना चमके सोनहुला किरनिया से कहि द.
          नयन में सपनवां बनल बाटे पाहुन,
          सनेसवा जमुनियां बदरिया से कहि द.
लिलारे चनरमा के टिकुली बा टहटह,
लुका जाय कतहूं अन्हरिया से कहि द.
          न आवेले सब दिन सुहागिन ई रतिया,
          तनी कोहनाइल उमिरिया से कहि द.
नयन के पोखरिया भइल बाटे लबलब,
ना झलके भरलकी गगरिया से कहि द.

        विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

            

9.24.2009

बंगलोर में पॉँच दिन

तीसरा दिन
तीसरा दिन के शुरूआत भइल मृत्युंजय के कमरा पर. उहां ओकरा साथ रहे वाला मित्र लोग से व्यापक बतखोरी भइल. सब के पास अपन प्रेमिका रहे जेकरा से बात करे में लोग दिन दुनिया भुला गइल रहे. मृत्युंजय के छवि हमेशा से एक GOOD BOY वाला रहल. क्लास में उ पढाई के अलावा कवनो चीज के बारे में बात करे से कतराए. लेकिन इहां वोकरा जीवन शैली में गजब के परिवर्तन देखनी. अब उ पढाई से इतर तथाकथित अनैतिक बात में भी खुल के हिस्सा लेता. समय के साथ परिवर्तन ही मनुष्य के दोसर नाम ह.
दिन में खाना खा के हमनी के सिटी स्टेशन के निकट मैजेस्टिक पहुंचनी सन लौटे के टिकट लेवे. मैजेस्टिक पर देखनी की कुछ जवान लडकी आ औरत खडा बाडीसन. पता चलल इ लोग वेश्या ह.हमर शक भईल रहे पहिला बार स्टेशन से बाहर निकले के क्रम में लेकिन शक के आधार पर केहू के गलत पहचान कईल ठीक ना रहे. किताबी जानकारी के आधार पर एतना पता रहे की दक्षिण भारत में मंदिर के देवदासी प्रथा बाद में कुत्सित हो के वेश्या निर्माण के साधन बन गईल. सब तरह से आश्व्स्थ भइला पर हम इ लोग से बात करेके प्रयास कईनी लेकिन भाषिक संरचना में अंतर बात ना पूरा होए देलख.हम जाने समझे के चाहत रनी कि इ लोग इ हाल में काहे पहुंचल, सरकार पुनर्वास के कोई गंभीर प्रयास काहे नइखे करत, अगर व्यवस्था बा त उ कार्य रूप में काहे नईखे दिखत.
चौथा दिन
     काफ़ी ऎने-ओने बउअईला के बाद हम अजय के भैया के डेरा  COX TOWN चल गईनी रात एही जांन कटल. इहां नेट आ केबल कनेक्शन समय काटे में सहभागी बनल. बाहर जाय के मन अब तक लगभग समाप्त हो गइल रहे.बंगलोर के मौसम हमेशा काफ़ी निमन रहेला.दिन में गुनगुनात धुप आ दिन में कई बेर मेघ मौसम के और सुहाना बना देवेला.रात में सूते समय एक चादर हमेशा उपयोगी होला.लेकिन जब हम पहुंचनी त दिन में बारिश के अता-पता ना रहे साथ ही धुप आवरो तेज हो के निकलल.लोग बतईलख की इ तोहरा दिल्ली से अईला के कारण उहां के कुछ अंश खीच लेले बा.कुल मिलाके सारा लोग इहां के मौसम के बखान कइलख लेकिन हम भूगोल में पढला के आधार पर ही ओ लोग के समर्थन कईनी उहां मिलल अनुभव से ना.
चौथा दिन ही हमर एगो गांव के पुरान दोस्त चाहे कह ली कि लंगोटिया यार विष्णु जी के फ़ोन आइल की हम हवाई जहाज पर बैठ गईल बानी आ खाडी देश कमाए जा तानी.मन उदास हो गइल.एकरा साथ बितावल समय पर त कइ महीना लिखल ज सकता लेकिन आज ना फ़ेर कबो.आज ही सोनू के ट्रैन रहे उ घरे गईल अपना मां के आ हमरा बडकी दीदी के बरखी में जवन दशहरा के शुरू होय के दिन होला ए साल 19सितम्वर के रहे.आजे शाम हम प्रमित के डेरा चल देनी.रास्ता में हम शिवाजी नगर बस स्टाप पर हम दिशा के बोध भटक गईल आ हम रास्ता भूला गईनी.बहुत देर तक आवे-जाए वाला लोग के ही देखत रहनी लोग से पुछ के परेशान रनी कोई उपाए ना सुझे.एही उधडबुन में हमर साथ देलख बस के महिला कंडक्टर.अपना साथ ले जा के हमरा निश्चित जगे पर जाए वाला बस में चडा देलख लेकिन एकरा ला ओकर धन्यवाद कईला पर उ कुछ बोलल लेकिन हम समझ ना पईनी.बस में औरत लोग के काम करत देखल ई हमर पहिला अनुभव रहे.मन काफ़ी खुश भइल की दुनिया के एगो पिछ्डल समुदाय के भी अब प्रतिनिधित्व मिलल शुरू हो गईल बा अईसे अब भरतीय सेना आ अर्धसैनिक बल में भी ए लोग के सेवा कुछ दिन से शुरू हो गइल बा.रास्ता में चिन्ना स्वामी स्टेडियम गईनी जेमें KPL(कर्नाटक प्रिमियर लीग) के मैच समाप्ति पर रहे.गेट न.7 पर नेशनल क्रिकेट अकादमी के कार्यालय देख के ही अपने आप के संतोष दिलइनी. 
पांचवा आ अंतिम दिन
तब तक आ गईल पांचवा आ चले के दिन.सबेरे-सबेरे तैयार हो के अरविंद भैया के घरे माराथल्ली पहुंचनी जहां स्कूल के दिन के सारा याद ताजा हो गईल.उनका इ गो रूम मेट लोग से भी मिले के मौका मिलल.कुछ देर बात रूकला के बाद उ IBM ला निकल गईले आ हम उनकर एगो दोस्त के साथ बाइक के सवारी पर निकलनी.हमरा के उ स्टेशन पहुंचा के अपना आफ़िस लौट गइले.
वापसी हमर कर्नाटका संपर्क क्रान्ति से भइल.जवन ऎह दिने भाया पुणे दिल्ली पहुंचेला. बंगलोर से पुणे पहुंचे के क्रम में पहाड के बीच से गुजरत-गुजरत मन आकुल हो गइल. कहीं-कहीं त ट्रैन ऎतना उंचाई पर चले की नीचे के लोग काफ़ी छोट लउके.पटरी के दूनू ओर सघन रूप से नारियल के खेती भइल रहे जेकरा बीच-बीच में केला आ दोसरा फ़ल-फ़लहरी लगावल रहे.पुणे पहुंचला पर स्वाईन फ़्लू के भय मन में रहे जेकरा चलते ओतना देर गाडी रूकला के बावजूद हम नीचे ना उतरनी. लोग मुंह में मास्क लगा के बडका भारी संख्या में घुमत रहे.ट्रैन के घटीया खाना खात हम विश्वकर्मा पूजा के दिन दस बजे दिल्ली पहुंचनी.
   बंगलोर के बात अब समाप्त होता अगिला बेर फ़ेर कुछ नया देवे के कोशिश करेम.
इ ब्लोग में  अब फ़ेर बदल के छापल जाता काहे की कुछ लोग के प्रतिष्ठा आ मन के ठेस पहुचल ह उ लोग हमर अपन दिल के काफ़ी नजदीक रहे वाला रल लोग . एही से हम ब्लोग में कुछ व्यक्तिगत बात भी लिखनी लेकिन कुछ लोग के आपति होई इ बात हम ना सोच पइनी .जेकरा-जेकरा बात बुरा लागल होई ओ लोग से हम माफ़ी के उम्मीद करेम.हम ई बात भी कह दी की ई ओईसन बात रल जवन बहुत त खराब ना रल लेकिन लोग से छुपावे ला मित्र लोग के इहे सोच बा त ओमें हम ई लोग के साथ तहे दिल से देम.
 पढ के प्रतिक्रिया भी जरूर दी लोगन जे से और नया ताजगी लावल जा सके.
राउर और केवल अपने लोग के संघतिया
  प्रहलाद मिश्रा
  (कुणाल किशोर विध्यार्थी)

9.21.2009

बंगलोर में पांच दिन


बंगलोर में दूसरा दिन


दूसरा दिन घुमे के नामे रहल. घर से ताजा हो के निकलनी सन . एगो रेस्टोरेंट पहुंचनी सन नास्ता करे. उहां खाली दक्षिण भारतीय नास्ता के जोगाड रहे जेकरा के खा के हमनी आगे बढनी सन. इहां से पहुंचनी सन फ़ोरम, बंगलोर के सबसे बडका मौल. PRESTIGE GROUP द्वारा बनावल इ मौल बडा ही भव्य रहे. दुकान के संख्या त गिनल मुश्किल रहे. समान बिक्री के विविधता आ डिजाइन देख के हम अभिभूत रनी. इ दोसर बात रहल की हमनी के कुछ किननी सन ना. उपर में PVR सिनेमा रहे जेमें एक साथ कमीने आ कोई दक्षिण के सिनेमा चलत रहे. नीचे से उपर तक सब फ़्लोर जाए में हमनी के कई घंटा लाग गईल. ओकरा बाद हमनी के बगल में रहल बिग-बाजार में गइनी सन. जवन शायद हमरा देखला अनुसार दिल्ली के सारा बिग-बाजार से बहुत बडन ही ना रहे ओमें काम करे वाला स्टाफ़ आ सामान के विविधता भी देखला से बने. प्रमित और ओकर एक दोस्त कुछ सामान खरीदलें लेकिन एतना चलवइलख लोग की पैर जबाव दे देलख एकर एगो औरो ठोस करण रहे की हम प्रमित के सैंडल पहिनले रनि जौन छोट भइला के कारण समय-समय पर मुस लखा पैर कतरे लागल रहे. एकरा बाद घरे आवे के निर्णय भइल.

दिन भर घुमला के क्रम में हम महसूस कइनी की कपडा के अश्लीलता में बंगलोर अभी दिल्ली से काफ़ी पीछे बा त सुरक्षा आ स्त्री स्वतंत्रता में बहुत आगे. जवान लडकी आ औरत सब के ड्रेस देख के इ बात बुझाए की इहां भूमंडलीकरण के हावा त जरूर लागल बा लेकिन अपना परचम तक नइखे पहुंच पाईल. लडका-लडकी के साथ घुमे के चलन आ स्कूटी आदि के मामला में अभी एकर पीछा करे में और महानगर के सोचें के पडी. रात में काफ़ी देर तक औरतन के घर से बाहर रोड पर घुमत आ बस स्टाप पर केकरो इंतजार करत देखल आम बात रल. रास्ता में बहुत मंदिर भी दिखल. द्रविड शैली में निर्मित आज के भी मंदिर देखला से लागे की इ प्राचीन काल में ही बनल बा. मंदिर के आगे बनल प्रवेश द्वार पर बहुते देवता लोग के मूर्ति आउर दिक्पाल आदि के सुंदर-सुंदर प्रतिमा से सजावल रहे . पुजारी लोग पीअर धोती लपेटले, गला में आ हाथ में सोना के वजनदार गहना पहिनले, कीमती मोबाइल रख के भगवान के सेवा में लागल दिखले.

अगिला दिन के बारे में जाने ला करी तनका सा इंतजार. पिछ्ला ब्लोग बडका हो गइल रहे जवन ठीक ना रल, ऎसे अब लंबाई छोट क दिआईल बा.












बंगलोर में पांच दिन


दोपहर एक बजे हम संघर्ष करत बंगलोर स्टेशन पर उतरनी. पता ना हमर आज के का संयोग रहे की जेकरा से मिले दिल्ली से दूर गइनी उ हमरा से ना मिले के सारा जतन कइलख . गाडी अभी बंगलोर कैंट में रहे तबे ओकर फोन आइल की इहां रहे के अवरो दोसर कवनो जगह नइखे. हमरा बिहान घरे जाए के बा. कैंट में ही सेना के सारा जवान अपना साथ लाइल 15किलो के घी आ लड्डू ले के उतर गइले. हम पुछ्नी वो लोग से की शांति के समय अब का काम करे के होई त ओमें से एक जवान गाडी से दिखत एगो कैंप के ओर ईशारा क के देखइले, हम देखनी की कुछ सैनिक वर्दी में लोग अपना हाथ में घास लेके एक जगह से दूसर जगह जात रहले. तब हम आजतक के दुविधा से निकल के ए लोग के फ़ुरसत के समय करे वाला काम के अंदाज लागल.
बंगलोर में पहिलका दिन
हमूं कहां माने वाला जंत रनी, ट्रैन से उतर के उनकर पता लेनी आ सीधे मैजेस्टिक से बस पकड के बंगलोर से 78किलो मीटर दूर तुमकूर पहुचनी. भेंट त भइल लेकिन संतोषप्रद ना रहल. इ अपन डेरा छोड के दोसर कुछ दोस्त के साथ अपन सामान इ आशा में धइले रहे की फिर अपन दोसर घर में सिफ़्ट हो जाएम. उहां पहुंच के हम देखनी की तीन गो मुसलिम छात्र लोग रहत रहे, एक- दू आदमी के दाढी बहुत बढल रहे जेसे हमरा शक भइल की इ लोग निश्चित रूप से प्रबंधन के पढाई गंभीरता से नइखे करत भले ओमें लाग के अभिभावक के खर्च पर खरा उतरे के कोशिश मात्र करता लोग. रूम पर ना ही कुछ व्यवस्थित रहे ना बइठे-आराम करे के जगह. तब हमरा पास एके गो विकल्प बचल रहे की हम प्रमित,  मृत्युंजय    के पास बंगलोर टाउन लौट जाई. एही क्रम में शाम हो गइल आ हम मेन टाउन लौटे के फ़ैसला कइनी.             

मन में उलझन आ सामाजिक-पारिवारिक विवशता के कारण कुछ ना बोल के, ना ही कुछ सलाह दे के हम वापस बस में बइठ गइनी. तब तक अंधेरा चारू ओर फ़इल गइल रहे. भाषा के समस्या से जुझत नया जगह के दूरी के अंदाज ना रहला के बावजूद हम चल देनी बिना इ सोचले की हम उहां कब पहुंचेम. जाम के चलते समय के लंबाई बढत जाय लेकिन समय-समय पर मित्र लोग के फ़ोन आ अरविंद भैया के इ विश्वास के जहां भी भूलैइह फ़ोन क दिह हम आके अपना गाडी से ले जायम कबो मन में चिंता के लकीर ना आवे देलख. रात में 10बजे मैजेस्टिक पहुंचनी.

मैजेस्टिक इहां के एक बस स्टेन ह जवन सिटी स्टेशन से साफ़ सटल बा. इहां के निर्माण अईसन कईल बा कि इ देश के दोसर जगह से अपन अलग पह्चान बनावे. बस के आवे-जाय ला प्लेट्फ़ोर्म बनवल बा. सारा प्लेट्फ़ोर्म के उपर छ्त नुमा संरचना बा जेकरा चलते मुसाफ़िर एक जगह से दोसर जगह जाए में बस के बीच से ना गुजरे के पडेला. साथ में ही हर छ्त के गेट भिन्न-भिन्न दिशा में निकलेला, स्टेशन से सीधे इहां पहुंचेला अंडरपास बनल बा जेसे की दुर्घटना के संभावना नगण्य हो जाला. प्लेट्फ़ोर्म न.-17 से बस पकड के हम कोरमंगला पहुंचनी. जहां इंतजार करत प्रमित के साथ हम उनका घरे गइनी. उनका साथ में उनकर दू गो साथी लोग भी रहले जिनकर व्यवहार में नयापन के कोई गंध ना रहे.

प्रमित हमर बहुत पुरान आ आत्मीय मित्र बाडन. उनका से परिचय जिला स्कूल में ही भइल रहे लेकिन दोस्ती में प्रगाढता तब आइल जब हमनी के चार दोस्त प्रमित, अनुराग, वरूण आ हम साथ-साथ पटना रहे लगनी सन. ऎमे से तीन लोग ENGINEERING के पढाई करे क्रमशः RVC बंगलोर ,IIT गुवाहाटी, IIIT इलाहाबाद आ हम दिल्ली आ गइनी. प्रमित इहां CISSCO कंपनी में, अनुराग भोपाल में BHELमें काम शुरू क देले बा आ वरूण अपन अंतिम साल पूरा करके नौकरी के तालाश में माथापच्ची करता, हम अपना भाग्य के फ़ैसला उपर वाला के हाथ में सौंप के भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाय ला समय के साथ संघर्ष करतानी.
अरविंद भइया से परिचय पढाई के शैशवकाल से बा. जब हमनी दूनू आदमी मोतिहारी होस्टाल में साथ-साथ रहनी सन , लेकिन उ हमरा से 7-8 साल सीनियर रले लेकिन लगभग एक दशक बाद मिलला के बाद उनका व्यवहार में कोई बदलाव ना रहल.अब बात मृत्युंजय के त ओकरा बारे में बता दी की ओकरा से पह्चान दीनबंधु सर आ संजीव के माध्यम से भइल जवन कलांतर में और मजबूत होत गइल.

प्रमित से मिलला के बाद हमनी के अपना बचपन के याद सब के पुनर्जीवित करे के प्रयास करे लगनी सन . भारी थकान के बावजूद आधा रात के बाद तक हमनी के बात कईनी सन. जेमे पिछला 6-7 साल के कथा-पुराण ही मुख्यतः रहल. साथ ही निजी कंपनी में काम करे के अनुभव आ ओकरा भविष्य के विषय में भी तफ़्सील से बात भईल. हमरा बंगलोर अचानक आवे के कारण आ विस्तार से घुमे के प्लान भी निश्चित कईल गईल. दिल्ली से कोई आवे आ दिल्ली के बात ना होए इ संभव नइखे, लगले हाथ दिल्ली-बंगलोर के तुलना भी भइल आ अभी बंगलोर के महानगर के दर्जा ना देवे के भी विचार पर सहमती बनल. मेट्रो आ फ़्लाईओवर के कछुआ गति से होत काम ला भी सरकार के उपर जिम्मेदारी थोपाइल. प्रमित से भेंट होए आ क्रिकेट के बात ना होई इ संभव नइखे.वर्तमान विश्व क्रिकेट पर भी सब खिलाडी के व्यक्तिगत रिकोर्ड के साथ नजर देहल गइल.
अंतिम बात उ जेकरा बारे में हमरा से कई लोग लोग अभी तक पुछ चुकले . उ इ की प्रमित आज हेतना पईसा कमाता,एतना दिन बाद ओकरा से मिलला पर व्यवहार में कुछ परिवर्तन लागल ह की ना. त हम कहे के चाहतानी की हमरा त प्रमित के व्यवहार , रहन-सहन, चाल-चलन आ जरूरत से ज्यादा आक्रामकता के शैली, बात-चीत के ढंग वोइसने लागल जइसन आज से पांच साल पहिले के भेंट में लागल रहे. पैसा आ पद के साथ व्यक्ति में अगर बदलाव आ जाए त उ अपना मूल से कट जाला आ ना घर के ना घाट के रह के हो जाला, हमर इ सलाह आ सुझाव दूनू बा कि लोग चाहे केतनो बढका हो जाय ओकरा अपना परिवार, समाज, आ लोग के प्रति व्यक्तिगत व्यवहार में कबो परिवर्तन महसूस ना होए देवे के चाहीं.

इ यात्रा विवरण ना ह. केवल आवे-जाए के अनुभव मात्र ह जवना के प्रत्येक दिन के अनुसार पांच भाग में बांट के प्रस्तुत कइल जाता.








9.14.2009

कर्नाटका एक्सप्रेस




बहुत दिन से विचार रल बंगलोर जाय के लेकिन पलान सफल ना हो पावत रल .०९सितम्बर के अचानक चल देनी काहे की बहुत दिन से सोचल, सोचले रह जाला दिल्ली में आजकल बहुत गर्मी रल हमरा चले से कुछ देर पाहिले जे बारिश शुरू भएल कए दिन तक बरसल ऐसन फ़ोन पर पता लागल .खैर हम मेघ के बीच कर्नाटका एक्सप्रेस में बैठ गैनी .गाड़ी अपने समय से खुलल लेकिन यात्रा के बोरियत दौर परम्परा अनुसार ऐहु जांग बनल रहे .हमरा बोगी में ७२ में से ५५ यात्री सेना के जवान रहे लोग , अनुभव दोहरा रहल इक करेला दूजा नीम चढ़ल काहे की एक सैनिक दोसर हरियाणा के पूछे के का रहे एक वाक्य में आधा से ज्यादा गाली रहल जरूरी हा। हम अपना प्रकृति के अनुसार चुप रहनी ज्यादा देर तक लेकिन ४० घंटा चुप नएखे रहल जा सकत लोग के हंगामा के बीच रात में सुतल कठिन रहे गाड़ी के खाना भी बहुत घटिया रहे ऊपर से पैसा भी ज्यादा लेलक जेकरा ला लफडा भी भइल।
दिल्ली से चालला के कुछ देर बाद रात हो गइल हम अपना आदत के अनुसार बहार देखे लगनी अँधेरा में संजोग से देखल स्टेशन ही पार कैलाख सवेर भइल सुषमा स्वराज के लोक सभा विदिशा से इहा हम अपना एक परिचित के काम करे वाला अख़बार नवभारत खोजनी लेकिन कवनो जगह मिलल मध्य प्रदेश काफी कृषि में उन्नत लागल ,लोग के व्यवहार भी ठीक रहे
एकरा बाद गाड़ी महारास्ट्र में पहुचल जगह उत्तर भारत से काफी अलग लागल पाहिले लोग के भाषा बदल गइल ओकरा बाद विचार भी भाषा समझे में कठिनाई रहल भारत के विशिष्टता में एकता के परिचय मिलल सामान बेचे वाला बात समझ ही जा सन इहा से पहाड़ दिखल चालू भइल देखे में जबरदस्त सुंदर लागे पहाड़ के बीच से जब गाड़ी निकले सुन्दरता के वर्णन काइल सम्भव नइखे इहां से सबसे अलग चीज देखनी की खेत में काम करत अउर सड़क पर चलत लोग काफी संख्या में गाँधी टोपी पहिनले रले जेसे हम अनुमान कइनी की इहा अभी तक गाँधी के कुछ विचार बचल होई लेकिन जब हमर ध्यान राज ठाकरे पर जाला तब विचार साफ उलट जाला हम बात समझ ना पवेनी की एहू आदमी के इहा के संस्कार मिलल बा की बाहर के राज के जरूर अपना परम्परा से सीखे के चाही दोसर बात की एहा बहुत महिला लोग भारी काम में लागल रहे ।हमरा आश्चर्य भइल की राज्य से बहुत लोग केन्द्र में मंत्री हमेसा रहल बा लेकिन एकर उपाय इनका लगे नइखे भले मराठा मानुष के नाम पर सब लोग अपन च्त्रपयी भूल के एके गो बैनर में के कूदे लागेला लोग इहे देखे में रात हो गइल तब तक अहमदनगर के आगे ट्रेन पहुचल एही बीच लोकल पुलिस के मुगलिया फरमान आइल की सब लोग अपना -अपना खिड़की बंद कर ले कुछ लोग के साथ हमरो सवाल रहे काहे लोग के जवाब आइल अपना काम से मतलब राखी जे कहल जाता करी
इहा से गाड़ी आन्ध्र प्रदेश में प्रवेश कैलख इहा से एगो अलगे दुनिया शुरू भइल। हमरा लागल की संसार के सारा भिखमंगा ,लुल्हा -लंगडा इहे बाड़ सन औरत से मर्द ,बुढ से बच्चा सब इहे काम करातारासन का जाने सरकार के ख़बर पता बा की ना .अगर जान के व्यव्हार बा आवे वाला चुनाव में एकर कीमत देवे के पड़ी
इहे सब झेलत कर्णाटक के सीमा में घुसनि पहाड़ के बिच से गाड़ी गुजरे के सिलसिला के बाढ़ गइल। सुर्युदय के समय पहाड़ के बिच से गुजरत अपने आप में असीम आनंद देवे वाला रहल इहा के माहौल भी लगभग पहिलही जिसन रहे इहा हिजडा अचानक से बढ़ गएल्सन। लेकिन एकर चिंता फौज के जवान लोग आवे के पाहिले ही दूर देवे एही जांग लोग से एक मात्र फैदा भइल अंतत गाड़ी के खाना -पानी ख़तम हो गेल तब भूखे दिन मे बजे बंगलोर सिटी स्टेशन पर उतर पहुचनी आगे के यात्रा विवरण अगिला ब्लॉग में
ब्लॉग हम बंगलोर से ही पोस्ट करतानी