9.21.2009

बंगलोर में पांच दिन


दोपहर एक बजे हम संघर्ष करत बंगलोर स्टेशन पर उतरनी. पता ना हमर आज के का संयोग रहे की जेकरा से मिले दिल्ली से दूर गइनी उ हमरा से ना मिले के सारा जतन कइलख . गाडी अभी बंगलोर कैंट में रहे तबे ओकर फोन आइल की इहां रहे के अवरो दोसर कवनो जगह नइखे. हमरा बिहान घरे जाए के बा. कैंट में ही सेना के सारा जवान अपना साथ लाइल 15किलो के घी आ लड्डू ले के उतर गइले. हम पुछ्नी वो लोग से की शांति के समय अब का काम करे के होई त ओमें से एक जवान गाडी से दिखत एगो कैंप के ओर ईशारा क के देखइले, हम देखनी की कुछ सैनिक वर्दी में लोग अपना हाथ में घास लेके एक जगह से दूसर जगह जात रहले. तब हम आजतक के दुविधा से निकल के ए लोग के फ़ुरसत के समय करे वाला काम के अंदाज लागल.
बंगलोर में पहिलका दिन
हमूं कहां माने वाला जंत रनी, ट्रैन से उतर के उनकर पता लेनी आ सीधे मैजेस्टिक से बस पकड के बंगलोर से 78किलो मीटर दूर तुमकूर पहुचनी. भेंट त भइल लेकिन संतोषप्रद ना रहल. इ अपन डेरा छोड के दोसर कुछ दोस्त के साथ अपन सामान इ आशा में धइले रहे की फिर अपन दोसर घर में सिफ़्ट हो जाएम. उहां पहुंच के हम देखनी की तीन गो मुसलिम छात्र लोग रहत रहे, एक- दू आदमी के दाढी बहुत बढल रहे जेसे हमरा शक भइल की इ लोग निश्चित रूप से प्रबंधन के पढाई गंभीरता से नइखे करत भले ओमें लाग के अभिभावक के खर्च पर खरा उतरे के कोशिश मात्र करता लोग. रूम पर ना ही कुछ व्यवस्थित रहे ना बइठे-आराम करे के जगह. तब हमरा पास एके गो विकल्प बचल रहे की हम प्रमित,  मृत्युंजय    के पास बंगलोर टाउन लौट जाई. एही क्रम में शाम हो गइल आ हम मेन टाउन लौटे के फ़ैसला कइनी.             

मन में उलझन आ सामाजिक-पारिवारिक विवशता के कारण कुछ ना बोल के, ना ही कुछ सलाह दे के हम वापस बस में बइठ गइनी. तब तक अंधेरा चारू ओर फ़इल गइल रहे. भाषा के समस्या से जुझत नया जगह के दूरी के अंदाज ना रहला के बावजूद हम चल देनी बिना इ सोचले की हम उहां कब पहुंचेम. जाम के चलते समय के लंबाई बढत जाय लेकिन समय-समय पर मित्र लोग के फ़ोन आ अरविंद भैया के इ विश्वास के जहां भी भूलैइह फ़ोन क दिह हम आके अपना गाडी से ले जायम कबो मन में चिंता के लकीर ना आवे देलख. रात में 10बजे मैजेस्टिक पहुंचनी.

मैजेस्टिक इहां के एक बस स्टेन ह जवन सिटी स्टेशन से साफ़ सटल बा. इहां के निर्माण अईसन कईल बा कि इ देश के दोसर जगह से अपन अलग पह्चान बनावे. बस के आवे-जाय ला प्लेट्फ़ोर्म बनवल बा. सारा प्लेट्फ़ोर्म के उपर छ्त नुमा संरचना बा जेकरा चलते मुसाफ़िर एक जगह से दोसर जगह जाए में बस के बीच से ना गुजरे के पडेला. साथ में ही हर छ्त के गेट भिन्न-भिन्न दिशा में निकलेला, स्टेशन से सीधे इहां पहुंचेला अंडरपास बनल बा जेसे की दुर्घटना के संभावना नगण्य हो जाला. प्लेट्फ़ोर्म न.-17 से बस पकड के हम कोरमंगला पहुंचनी. जहां इंतजार करत प्रमित के साथ हम उनका घरे गइनी. उनका साथ में उनकर दू गो साथी लोग भी रहले जिनकर व्यवहार में नयापन के कोई गंध ना रहे.

प्रमित हमर बहुत पुरान आ आत्मीय मित्र बाडन. उनका से परिचय जिला स्कूल में ही भइल रहे लेकिन दोस्ती में प्रगाढता तब आइल जब हमनी के चार दोस्त प्रमित, अनुराग, वरूण आ हम साथ-साथ पटना रहे लगनी सन. ऎमे से तीन लोग ENGINEERING के पढाई करे क्रमशः RVC बंगलोर ,IIT गुवाहाटी, IIIT इलाहाबाद आ हम दिल्ली आ गइनी. प्रमित इहां CISSCO कंपनी में, अनुराग भोपाल में BHELमें काम शुरू क देले बा आ वरूण अपन अंतिम साल पूरा करके नौकरी के तालाश में माथापच्ची करता, हम अपना भाग्य के फ़ैसला उपर वाला के हाथ में सौंप के भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाय ला समय के साथ संघर्ष करतानी.
अरविंद भइया से परिचय पढाई के शैशवकाल से बा. जब हमनी दूनू आदमी मोतिहारी होस्टाल में साथ-साथ रहनी सन , लेकिन उ हमरा से 7-8 साल सीनियर रले लेकिन लगभग एक दशक बाद मिलला के बाद उनका व्यवहार में कोई बदलाव ना रहल.अब बात मृत्युंजय के त ओकरा बारे में बता दी की ओकरा से पह्चान दीनबंधु सर आ संजीव के माध्यम से भइल जवन कलांतर में और मजबूत होत गइल.

प्रमित से मिलला के बाद हमनी के अपना बचपन के याद सब के पुनर्जीवित करे के प्रयास करे लगनी सन . भारी थकान के बावजूद आधा रात के बाद तक हमनी के बात कईनी सन. जेमे पिछला 6-7 साल के कथा-पुराण ही मुख्यतः रहल. साथ ही निजी कंपनी में काम करे के अनुभव आ ओकरा भविष्य के विषय में भी तफ़्सील से बात भईल. हमरा बंगलोर अचानक आवे के कारण आ विस्तार से घुमे के प्लान भी निश्चित कईल गईल. दिल्ली से कोई आवे आ दिल्ली के बात ना होए इ संभव नइखे, लगले हाथ दिल्ली-बंगलोर के तुलना भी भइल आ अभी बंगलोर के महानगर के दर्जा ना देवे के भी विचार पर सहमती बनल. मेट्रो आ फ़्लाईओवर के कछुआ गति से होत काम ला भी सरकार के उपर जिम्मेदारी थोपाइल. प्रमित से भेंट होए आ क्रिकेट के बात ना होई इ संभव नइखे.वर्तमान विश्व क्रिकेट पर भी सब खिलाडी के व्यक्तिगत रिकोर्ड के साथ नजर देहल गइल.
अंतिम बात उ जेकरा बारे में हमरा से कई लोग लोग अभी तक पुछ चुकले . उ इ की प्रमित आज हेतना पईसा कमाता,एतना दिन बाद ओकरा से मिलला पर व्यवहार में कुछ परिवर्तन लागल ह की ना. त हम कहे के चाहतानी की हमरा त प्रमित के व्यवहार , रहन-सहन, चाल-चलन आ जरूरत से ज्यादा आक्रामकता के शैली, बात-चीत के ढंग वोइसने लागल जइसन आज से पांच साल पहिले के भेंट में लागल रहे. पैसा आ पद के साथ व्यक्ति में अगर बदलाव आ जाए त उ अपना मूल से कट जाला आ ना घर के ना घाट के रह के हो जाला, हमर इ सलाह आ सुझाव दूनू बा कि लोग चाहे केतनो बढका हो जाय ओकरा अपना परिवार, समाज, आ लोग के प्रति व्यक्तिगत व्यवहार में कबो परिवर्तन महसूस ना होए देवे के चाहीं.

इ यात्रा विवरण ना ह. केवल आवे-जाए के अनुभव मात्र ह जवना के प्रत्येक दिन के अनुसार पांच भाग में बांट के प्रस्तुत कइल जाता.








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