9.14.2009

कर्नाटका एक्सप्रेस




बहुत दिन से विचार रल बंगलोर जाय के लेकिन पलान सफल ना हो पावत रल .०९सितम्बर के अचानक चल देनी काहे की बहुत दिन से सोचल, सोचले रह जाला दिल्ली में आजकल बहुत गर्मी रल हमरा चले से कुछ देर पाहिले जे बारिश शुरू भएल कए दिन तक बरसल ऐसन फ़ोन पर पता लागल .खैर हम मेघ के बीच कर्नाटका एक्सप्रेस में बैठ गैनी .गाड़ी अपने समय से खुलल लेकिन यात्रा के बोरियत दौर परम्परा अनुसार ऐहु जांग बनल रहे .हमरा बोगी में ७२ में से ५५ यात्री सेना के जवान रहे लोग , अनुभव दोहरा रहल इक करेला दूजा नीम चढ़ल काहे की एक सैनिक दोसर हरियाणा के पूछे के का रहे एक वाक्य में आधा से ज्यादा गाली रहल जरूरी हा। हम अपना प्रकृति के अनुसार चुप रहनी ज्यादा देर तक लेकिन ४० घंटा चुप नएखे रहल जा सकत लोग के हंगामा के बीच रात में सुतल कठिन रहे गाड़ी के खाना भी बहुत घटिया रहे ऊपर से पैसा भी ज्यादा लेलक जेकरा ला लफडा भी भइल।
दिल्ली से चालला के कुछ देर बाद रात हो गइल हम अपना आदत के अनुसार बहार देखे लगनी अँधेरा में संजोग से देखल स्टेशन ही पार कैलाख सवेर भइल सुषमा स्वराज के लोक सभा विदिशा से इहा हम अपना एक परिचित के काम करे वाला अख़बार नवभारत खोजनी लेकिन कवनो जगह मिलल मध्य प्रदेश काफी कृषि में उन्नत लागल ,लोग के व्यवहार भी ठीक रहे
एकरा बाद गाड़ी महारास्ट्र में पहुचल जगह उत्तर भारत से काफी अलग लागल पाहिले लोग के भाषा बदल गइल ओकरा बाद विचार भी भाषा समझे में कठिनाई रहल भारत के विशिष्टता में एकता के परिचय मिलल सामान बेचे वाला बात समझ ही जा सन इहा से पहाड़ दिखल चालू भइल देखे में जबरदस्त सुंदर लागे पहाड़ के बीच से जब गाड़ी निकले सुन्दरता के वर्णन काइल सम्भव नइखे इहां से सबसे अलग चीज देखनी की खेत में काम करत अउर सड़क पर चलत लोग काफी संख्या में गाँधी टोपी पहिनले रले जेसे हम अनुमान कइनी की इहा अभी तक गाँधी के कुछ विचार बचल होई लेकिन जब हमर ध्यान राज ठाकरे पर जाला तब विचार साफ उलट जाला हम बात समझ ना पवेनी की एहू आदमी के इहा के संस्कार मिलल बा की बाहर के राज के जरूर अपना परम्परा से सीखे के चाही दोसर बात की एहा बहुत महिला लोग भारी काम में लागल रहे ।हमरा आश्चर्य भइल की राज्य से बहुत लोग केन्द्र में मंत्री हमेसा रहल बा लेकिन एकर उपाय इनका लगे नइखे भले मराठा मानुष के नाम पर सब लोग अपन च्त्रपयी भूल के एके गो बैनर में के कूदे लागेला लोग इहे देखे में रात हो गइल तब तक अहमदनगर के आगे ट्रेन पहुचल एही बीच लोकल पुलिस के मुगलिया फरमान आइल की सब लोग अपना -अपना खिड़की बंद कर ले कुछ लोग के साथ हमरो सवाल रहे काहे लोग के जवाब आइल अपना काम से मतलब राखी जे कहल जाता करी
इहा से गाड़ी आन्ध्र प्रदेश में प्रवेश कैलख इहा से एगो अलगे दुनिया शुरू भइल। हमरा लागल की संसार के सारा भिखमंगा ,लुल्हा -लंगडा इहे बाड़ सन औरत से मर्द ,बुढ से बच्चा सब इहे काम करातारासन का जाने सरकार के ख़बर पता बा की ना .अगर जान के व्यव्हार बा आवे वाला चुनाव में एकर कीमत देवे के पड़ी
इहे सब झेलत कर्णाटक के सीमा में घुसनि पहाड़ के बिच से गाड़ी गुजरे के सिलसिला के बाढ़ गइल। सुर्युदय के समय पहाड़ के बिच से गुजरत अपने आप में असीम आनंद देवे वाला रहल इहा के माहौल भी लगभग पहिलही जिसन रहे इहा हिजडा अचानक से बढ़ गएल्सन। लेकिन एकर चिंता फौज के जवान लोग आवे के पाहिले ही दूर देवे एही जांग लोग से एक मात्र फैदा भइल अंतत गाड़ी के खाना -पानी ख़तम हो गेल तब भूखे दिन मे बजे बंगलोर सिटी स्टेशन पर उतर पहुचनी आगे के यात्रा विवरण अगिला ब्लॉग में
ब्लॉग हम बंगलोर से ही पोस्ट करतानी


1 टिप्पणी:

  1. Nice presentation on 'the journy by the indian train' in an impressive style.. i am totally overwhelmed to see the blogs posted by you ..this creative yatravritant has all the manners of expression according to me ...

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